जला पतीला और बहू का चरित्र…..

बीस दिन से छोटी बहू सास की सेवा के लिए प्रस्तुत थी,अपना हर काम मनोयोग से करने की चेष्टा करती थी।हालांकि वह जिस घर से थी,वहां काम तो था,पर आधुनिक तौर तरीको वाला,और यहाँ सर्वथा भिन्न।बेचारी मुरझा गई थी,पर जेठानी की प्रसूति के अब 11 दिन हुए थे,तो उनकी देखरेख भी करती थी।पर गांव का कठिन तौर तरीको वाला काम,उसपर भारी पड़ रहा था,करती जाती इस बीच भूख लगकर खत्म हो जाती।खाना भी नहीं खाया जाता,कपड़े धोने बैठती तो साड़ी सारी ही गीली हो जाती।फिर बदलती,फिर गीली होती,बर्तन भी बैठकर धोने होते, पल्लू सम्हालती नीचे से भीग जाती।
मोरी भी बाहर थी,जहाँ बैठक का कमरा वहीं आंगन।वह सोचती कोई नहीं हो तब तक काम निपटा ले..पर गांव का घर व्यवहारिकता कुछ ज्यादा ही थी।किसी तरह जल्दीबाजी करती,क्योंकि घूंघट लेकर उससे काम ना होता और अगर किसी के सामने गिर जाए तो सास तो काली का रुप हो जाती थी।वह वैसे भी सीधी साधी और सरल थी,मुंहजोरी करना नहीं जानती थी।तो बहस की कोई गुजांइश ना रखती।यद्यपि नवाचार से पूर्णतया शिक्षित थी।
पढ़ाई लिखाई और दूसरे गुणों की यहां कोई कद्र ना था,काम में कोताही ना हो,ढेर सारा काम करो औरतजात हो।सिलाई कढ़ाई क्यों नहीं आती,।यहां सबको सीखना होता है,फाल पीको करना सीखों।अपनी सास ननद की साड़ियां तैयार करना।बैठ कैसे गई, औरतजात हो।
चलिए ये तो आए दिन की बात थी,ये झाड़ू चलाना सीखों,ऐसे नहीं।जो पारंपरिक पुराना झाड़ू होता था..वो ही मिलता वहां पर जिसे चलाने में उसे हमेशा फांस चुभती,या ज्यादा काम करने से छाले पड़ जाते,फिर भी जेठानी की खातिर सब किए जाती।
एक दिन जेठानी जी,दलिया चढ़ाकर भूल गई, पूरा पतीला जल गया।छोटी बहू से साफ नहीं हुआ।दो चार बर्तन और रह गए थे,खाना बनाकर साफ करने ही जा रही थी कि सास और एक रिश्तेदार आ गए, वह ठिठककर रुक गई,कि अब कैसे धोऊं बर्तन।
इतने में जला पतीला देख सास का,तो गुस्सा फूट पड़ा,ये देखो बर्तन जला दिया,और सारे बर्तन भी साफ ना हुए,देख रहे हो नेमीचंद।मेरे बिना मेरा घर।बर्तन उठाकर फेंकने लगी,बहू घबरा गई, सारा दोषारोपण उस पर हो गया, ये आजकल की लड़कियाँ बर्तन कहाँ साफ करती है,नेमीचन्द बोले, अरे इन्हें तो आए दिन रेस्टोरेंट में खाने का शौक होगा,फैशन है आजकल का।ये घुमक्कड़ चरित्र की लड़कियां क्या जाने मर्यादा।कामकाज की तो पूछो मत।(इन्ही नेमीचंद के घर में अनपढ़ सास बहुओं की रोज लड़ाई होती)
जला पतीला छोटी बहू को मुंह चिढ़ा रहा था कि देखो तुम्हारा चरित्र चित्रण हो गया,पिछले दस-पंद्रह दिनों के सहयोग को भुलाकर उसका ऐसा अपमान किया,सारी रात रोती रही।
अगले ही दिन अपना सामान बांधकर निकल ली,मैं तो घुमक्कड़ जात हूंँ, मांजी।ज्यादा दिन एक जगह नहीं रहती।आप सम्हालें, अपना साम्राज्य।
तो देेेेखा आपने किस तरह एक जले पतीले ने बहू का चरित्र निर्धारित कर दिया,जो उसने नहीं जलाया था।वैसे चरित्र चित्रण किस का हुआ यहां पर..जरा सोचिये”

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